ॐ क्या है ?

प्राकृतभाषा जिसे संस्कृत की जननी कहा जाता है,ॐ को एक पवित्र  शब्द मानती है। संस्कृत में भी ॐ ओ +उ +म दो स्वर और एक अर्ध ब्यंजन से बना शब्द है जिसे विस्व की बीज शक्ति के समतुल्य माना जाता है। बिश्व की अन्य भाषाओ में भी ओम का प्रयोग होता है। जैसे डच भाषा में ओम का मतलब  अंग्रेजी में रूपांतरण करने पर   अबाउट निकलता है। यहाँ तक तो ठीक है परन्तु जब मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन भाषा चित्र लिपि की चर्चा करते है तो उस लिपि में भी ॐ शब्द मिल जाता है। मै उस लिपि की बात कर रहा हु जिसमे  किशी बड़ी संख्या को  लिखने के लिए दोनों हाँथ ऊपर किये आदमी का चित्र मिलता है। यानि उस समय न तो कोई अंक था न लिपि फिर ये ॐ कहा से उस लिपि में पंहुचा वास्तव में देवनागरी लिपि के इतिहास का अध्यन करने पर ये प्रमाणित होता है की संस्कृत का ॐ ज्यो का त्यों देवनागरी में प्रयोग होने लगा। संस्कृत में ॐ प्राकृत भाषा से ज्यो का त्यों आया क्योकि संस्कृत भाषा प्राकृत,यवाणी,भजपुरी(भोजपुरी ) ,अवधी ,मैथली ,सैथली ,कुवांड,लुवांड,ज्वाठी,हलथि,मियांजा,संस्थाली,बिरोछा ,कुमान्ड आदि चौदह भाषा को संस्कार देने के बाद बनी भाषा है इसमें से तो कुछ आदिबासी भाषाओ का तो संस्कार देते समय उनके उच्चारण या स्थान बिशेष के आधारपर नामकरण किया गया था जैसे संथाल परगना की भाषा सैथली। प्राकृत भाषा  में ॐ चित्र लिपि से आया यानि के कोई चित्र था। आखिर ये चित्र किसका था। चित्र लिपि में ॐ संलग्न  चित्र जैसा था इसमें सात बिंदु स्पष्ट दीखते है। ये सात बिन्दुओं का आखिर क्या मतलब हो सकता है ? इस प्रश्न के उत्तर के लिए बेदो  को टटोलते है। बेदो में सात लोको की चर्चा है। हमारेसूक्ष्म शरीर  मे सात चक्रो की चर्चा मिलती है सूक्ष्म योग के अधयन ने इसे स्पष्ट कर किया की ॐ एक मानचित्र है जो जीव की उत्पत्ति की गुथ्थी सुलझा सकता है ॐ किसी घर्म का प्रतिक चिन्ह मात्र नहीं है बल्कि एक मार्ग का मानचित्र है जो हमें जीव की उत्पत्ति के सही कारण तक पंहुचा सकता है चूँकि हिन्दू धर्म अत्यंत पुरातन धर्म है और ये धर्म भी ॐ के बारे में सच नहीं जानता बस स्वर और मंत्रो में प्रयोग किया या पूजा पाठ वाली जगह पर लिख दिया या फिर इसे अनेक तरह के बाध्ययन्त्रो  के बीच या इसे मात्र बजा कर योग आदि का प्रयास  किया इसके अलावा और कुछ नहीं किया। ये मानचित्र है ,सूक्ष्म शरीर यात्री है और मंजिल तक पहुचने के लिए  सात बिन्दुओ से गुजरना है। लेकिन अब प्रश्न उठता है के ये मंजिल क्या है ? घबराईये नहीं मै किशी  भगवान आदि की चर्चा नहीं करने वाला। आप  उस बिज्ञान की कक्षा में है जिसने नारियल में बिना छेद किये पानी भरा।

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इस प्रकार ॐ हिन्दू से काफी पुराना शब्द है . क्योकि हिन्दू एक शब्द है जिसका कोई भी मतलब हो ये अलग मुद्दा है मगर ॐ एक चित्र है जो वास्तव में उच्चारण करने की चीज नहीं बरन जीव के साक्षात्कार करने की चीज है और जीव  किसी बंधन में नहीं  होते न वतनपरस्त ना गद्दार न कोई धर्म की बेन्डिया न कोई पदोन्नति न कोई आरक्षण न परिवार का बोझ आखिर आदि मानव तो इन्ही जीवो की तरह तो होगा। फिर क्या उसके स्वार्थ ने ये बंधन डाले या फिर उसे किसी फल रस ने ऐसा बनाया। शैतान के फल की चर्चा हर धर्मग्रन्थ में पायी जाती है। हिन्दू शास्त्र ने मनु और शत्रुपा कहा तो इस्लाम उसे आदम और औआ  बाइबिल में तो इसका सबसे अच्छा जिक्र है ये सारे धर्म ग्रन्थ मिलकर बस ये कहते है के वो फल श्रापित था मानव के उस फल खाने के बाद ही वो जीव से आदमी बना जब के सच नहीं है इस भूलोक पर गोरिल्ला की प्रजाति पायी जाती है जो इस भूलोक की सबसे उन्नत प्रजाति का जीव है मानव वास्तव में इस भू लोक का जीव नहीं है और वो जब इस भूलोक पर आया तो फिर वापस जाने के लिए उसके पास गरूत्वाकर्षण से निपटने की ताकत नहीं थी,और वो इस ग्रह पर फंस गया . उसने गोरिल्ला का जीवन अपनाया उनकी मादा को अपना बंस आगे बढ़ने के लिए प्रयोग किया।  आने वाली पीढ़ी को उसने अपने मातृ ग्रह का मानचित्र दिया वो मानचित्र कुछ इस प्रकार का था

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इस चित्र में ॐ की सार्थकता सिद्ध करने का प्रयाश किया गया है। ॐ को शिर्फ़ किसी बिशेष धर्म का चिन्ह मान कर अवहेलना करना मानव के लिए नादानी होगी। ॐ पूरी मानवता मात्र में दखल न रखते हुए पुरे ब्रह्माण्ड में दखल देता है ॐ सात लोक जो अलग अलग आकाशगंगा में है उनकी पुष्टि करता है साथ ही तंत्र बिज्ञान में वर्णित बिराट चक्र को भी प्रमणित कर देता है। बिज्ञान अभी अपनी आकाश गंगा के अंतिम ग्रह प्लूटो तक पहुंच गया है उसे अभी  ६ अन्य आकाशगंगा के साथ साथ ६ अन्य अंधकूप  को तलाश करना बाकि है। तो चले क्या अपनी माता से मिलने वो पता नहीं किस जीवन ग्रह पर हमारी प्रतीक्षा कर रही होगी ?अब समय आगया है की घरती की सारी सरहदो को तोड़ कर इसे फिर से वैसा ही बना दिया जाय जैसा ये थी ! हम तो परदेशी है। परग्रही है मगर हम इस मायामयी भूलोक की गरूत्वाकर्षण माया में फंस कर इसे अपना घर समझ रहे है। जो इस बिज्ञान को समझ कर लम्बी यात्रा का शौख रखते है उनके लिए सूक्ष्मयोग  के द्वार हमेशा खुले है

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सूक्ष्म योग

प्राकृतिक शक्ति
आप की अपनी आंतरिक प्राकृतिक शक्ति

सूक्ष्म योग क्या है ?

हर मानव के  क्रिया कलाप होते है। इन क्रियाकलापों की यदि बिबेचना की जाय तो हमें मूलतः दो ही श्रेणियाँ मिलेगी। अर्थ शास्त्र के अनुसार भी मानव कर्म दो प्रकार के ही माने गए है १.अर्थिक क्रिया २ . अनार्थिक क्रिया उसी तरह से दर्शन शास्त्र में भी मानव के कर्मो के दो ही प्रकार बताये गए है १. आवश्यक क्रिया  2. नैशर्गिक क्रिया। आवश्यक क्रिया वो है जो मानव जीवन के लिए  जरूरी है जैसे खाना, सोना,जिम्मेदारियों को निभाना , मनोरंजन ,अपने शरीर ,परिवार ,समाज और अपने ग्रह की हिफाजत करना,प्रेम ,घृणा ,आशक्ति ,ज्ञान प्राप्ति आदि परन्तु कोई मानव जब कोई ऐसी क्रिया करता है जिसका उसकी मूल भूत आवश्यकताओ से कोई   सरोकार नहीं होता जैसे  किसी एकांत बैठे या किसी अन्य  बयक्ति से बात करते हुए अपने शरीर  का कोई अंग हिलाना  ,अपने चेहरे बाल आदि पर बेवजह हाथ फिरना तो इसे नैसर्गिक क्रियाओ  का नाम दिया जा सकता है।

नैशर्गिक क्रियाओ के प्रकार 

नैशर्गिक क्रियाओ को   दो श्रेणियों में बिभाजित किया जा सकता है।

1. सापेक्षित नैशर्गिक क्रिया ;-जिन नैशर्गिक क्रियाओ की प्रतिकिया में, समाज,क्रिया करने वाले मानव ,या प्रकृति में कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है सापेक्षित नैशर्गिक क्रिया कही जाती है। जैसे किसी ब्यक्ति का अपने किसी अंग को बेबजह सहलाना। या अनावश्यक हाँथ-पाँव -गर्दन आदि हिलाना।

२. अनपेक्षित नैशर्गिक क्रिया :-    सापेक्षित नैशर्गिक क्रिया के बिपरीत जिन नैशर्गिक क्रियाओ की प्रतिकिया में समाज,क्रिया करने वाले मानव ,या प्रकृति में कोई प्रतिक्रिया होती है , अनपेक्षित  नैशर्गिक क्रिया कही जाती है।जैसे किसी ब्यक्ति द्वारा नदी,तालाब में जल या दूध डालना। समान्यतः यदि देखा  जाय तो एक तरफ दूध या जल का दुरूपयोग होता दिखता है तो दूसरी तरफ नदी या तालाब का जल भी अपनी वास्तविकता से परिवर्तित होता है। इस प्रकार की क्रिया को लोग धर्म ,आस्था ,प्रकृति सेवा का नाम दे कर पीछा छुड़ाते है। मगर वास्तविकता कुछ और होती है।इस प्रकार की क्रियाओ पर असर होता है मानव के सूक्ष्म शरीर के   भाौतिक समन्वयन के कारण जो कारक शरीर के साथ बनती है और बिगड़ती है। सात अलग अलग आकाश गंगावो में स्थित ७ अलग बिंदु  जिसे हिन्दू शास्त्र ॐ का नाम देता है ,वास्तव में ॐ इन्ही ७ आकाश गंगावो का एक मानचित्र है ,७ सूक्ष्म शरीर मिल कर १ कारक शरीर का निर्माण करता है या दूसरे शब्दों में १ कारक शरीर ७ सूक्ष्म शरीर को नियंत्रित करता है। प्रतेक स्थूल शरीर में स्थित मेरुदण्ड एक आपस में आवेश सूत्र में बंधे होते है जिनकी प्रतिक्रिया सापेक्षित नैशर्गिक क्रिया  कहलाती है।मगर  अनपेक्षित नैशर्गिक क्रिया का कारण सूक्ष्म शरीर की आवेशित प्रतिक्रिया नहीं होती बल्कि कारक शरीर के भोग जो मूल बिराट चक्र के अनापेक्षित घटक से बनता है ,के कारण होती है। ये किसी बिशेष धर्म का पाठ नहीं है बल्कि एक प्रमाणित बिज्ञान है जो आज से करोडो साल पहले का है मगर उस समय की भाषा और शिक्षा आज की भाषा और शिक्षा से काफी अलग थी अतः ये प्राचीन बिज्ञान जो आपकी अपनी आंतरिक शक्ति के बुते पर चलता था आज खो गया है। मगर आज भी ये नैशर्गिक क्रियाओ के रूप में अपनी प्रमाणिकता सिद्ध कर रहा है।इसी बिज्ञान का नाम सूक्ष्म योग है।   

नैशर्गिक क्रियाओ का कारण

मनोबिज्ञान  में हुए हाल तक के खोजो के आधार पर नैशर्गिक क्रियाओ को मानसिक तनाव उद्वेग आदि की प्रतिक्रिया मान रहे है और पागलपन का नाम दे रहे है । जीव बिज्ञान इसे आदत का नाम दे कर टालने की कोशिस कर रहा है। अन्य  बिज्ञान तो इसे गड़ना भी नहीं करना चाहते। तर्कशास्त्र भी मनोबिज्ञान से ही  लगभग  मिलती परिभाषा देता है।

सूक्ष्म शरीर के प्रमाण 

जिसने इस प्रकृति को नजदीक से देखा है ,उसने इस प्रकृति को जीवित ,गतिमान, आपकी क्रियाओ के प्रति प्रेम  और नफरत करने वाली तथा मानव के खोजो को एक नयी दिशा देने वाली पाया है। एक ही कमरे में बैठे दो अलग ब्यक्ति समान या   दो अलग बातावरण का  अनुभव करते है जैसे किसी को ठंढ की अनुभूति होती है तो दूसरा पंखा चलना चाहता है।  हाल की परिस्थिति में दोनों अपने अनुभूति का प्रमाण देने में असक्षम होते है। सूक्ष्म शरीर या सूक्ष्म लोक के तरंगो की आहट या शोर की अनुभूति हर ब्यक्ति को समान न होने के भी कारण होते है।ये कदापि सत्य नहीं के जिसे आप नहीं देख पाते उसका अस्तित्व न हो। कभी आम के बागीचे में आपके साथी को पेंड़ो की झुरमुट में छुपा आम तुरंत दिख जाता है और आपको सिर्फ पत्ते नजर आते है ,कभी कभी तो आपको अपने साथी की बातो को सत्य मान कर खूब गौर करने पर ही आम नजर आता है। कभी कभी घर में कोई चाभी का गुच्छा सामने होते हुए भी नजर नहीं आता जबकि आप उसी जगह से कई बार गुजर चुके होते है ,फिर घर का कोई अन्य सदस्य वो चाभी का गुच्छा आपको दिखाते  है ,फिर आप लाख कोसिस के बाद भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं ढूंढ पाते के ये चाभी का गुच्छा आपको क्यों नही नजर आया। परछाई का कारण हमेशा उचित प्रकाश होता है मगर  अँधेरे में  परछाई का अनुभव डर का कारण बन जाता है। घोड़ो को बिना बजह बिदकते और कुत्तो को बिना वजह भौकते आपने देखा होगा। आपकी नंगी आँखे सब कुछ नहीं देख पाती या ये सिर्फ वो देखती है जो आपका मस्तिस्क दिखाना चाहता है। भ्रम भी सत्य है। मनोबिज्ञान भ्रम के दो प्रकार बताता है १) ब्यक्तिगत भ्रम २) बिश्वब्यापी भ्रम। अँधेरे में रस्सी को सांप समझाना ब्यक्तिगत भ्रम का दृस्टान्त है तो चलती गाड़ी में पेंड़ो को भागते देखना विश्वब्यापी भ्रम का उदाहरण है। सूक्ष्म शरीर पूर्ण बैज्ञानिक बस्तु है परन्तु जब तक आप इस बिज्ञान को पूरी तरह समझ कर अपने ज्ञानइन्द्रियो और मस्तिस्क को इसके काबिल नहीं बना लेते आप इसका अनुभव नहीं कर पाएंगे। ये परम सत्य है के भूत आपके सामने नहीं आते बल्कि आप अपने सूक्ष्म शरीर को भूत (काल ) में लेकर जाते है।